Sarabjit Singh – अनजाने में पाकिस्‍तानी सीमा पर पहुंचा था।

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बहन ने उसके जीवन के लिए 23 साल लंबी लड़ाई लड़ी!

पत्नी ने गुरुद्वारे में ना जाने कितनी ही अरदास लगाईं और बेटियों की आंखें अपने पिता को देखने के लिए तरस गई… लेकिन वो अपने पिंड वापिस नहीं लौटे।

ये कहानी है ‘Sarabjit ’ की. वो Sarabjit जिन्हें, उस गलती की सज़ा मिली, जो उन्होंने कभी की ही नहीं! उनका गुनाह तो सिर्फ इतना था कि उन्होनें बेसुध हालत में देश की सीमा के बाहर कदम रख दिया था।

वैसे तो, Sarabjit की कहानी किसी से छिपी नहीं है। साल 2016 में आई फिल्म ‘Sarabjit ’ देखकर लोगों की आंखें भर आईं थीं। फिल्म में सरबजीत की हालत दिल पर चोट कर गई थी। पर कहीं ना कहीं Sarabjit के जीवन के कई पहलू फिल्म में नहीं दिखाए गए। आखिर कुछ घंटे की फिल्म में पूरा जीवन किस प्रकार पिरोया जा सकता है?

तो आईये Sarabjit के असल जीवन के पहलुओं को जानने की कोशिश करते हैं–

बचपन से था पहलवानी का शौक

Sarabjit  Singh का जन्म पंजाब के भिखीविंड गांव में हुआ था, जोकि भारत में पंजाब के तरन तारन जिले के इंडो-पाक बॉर्डर पर स्थित है। उनके परिवार की हालत ज्यादा अच्छी नहीं थी। इस लिहाज से उनका पालन-पोषण आम तरीके से हुआ. वह बड़े हुए तो उन्होंने अपनी पुस्तैनी जमीन पर खेती-बाड़ी शुरु कर दी।

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Sarabjit की कद-काठी अच्छी थी, दूसरा उनको बचपन से ही पहलवनी में खासी दिलचस्पी थी, इस कारण उन्हें अक्सर इसका आनंद लेते हुए देखा गया. दूसरों की तरह उनके जीवन में वह पड़ाव भी आया, जब उन्हें घर बसाकर शादी के बंधन में बंधना पड़ा।

सुखप्रीत कौर नामक युवती को उन्होंने अपनी जीवन संगिनी बनाया. उनसे उन्हें स्वपनदीप और पूनम कौर नाम की दो बेटियां प्राप्त हुईं। कुल मिलाकर सरबजीत हंसी-खुशी से अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे।

…इस एक घटना ने बदल दी जिंदगी!

इसी बीच एक दिन उनके साथ कुछ ऐसा हुआ, जिसकी उन्होंने कभी कल्पना तक नहीं की होगी।  एक रात वह रोज की तरह अपने घर लौट रहे थे. बस लौटने में थोड़ी देरी हो गई थी. सूरज ढल गया था और अंधेरा अपने पैर पसार चुका था। दूसरी तरफ उन्होंने उस दिन शराब पी रखी थी।

इस कारण वह गलती से बॉडर्र के दूसरी ओर पंहुच गए… यानि पाकिस्तान!

यह वह समय था, जब बॉडर्र पर तार के बाड़े नहीं होते थे।

यूं तो वह गलती से दूसरे देश की सीमा पर पहुंच गए थे, किन्तु इस गलती का उन्हें बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ा। महज़ कुछ कदमों की दूरी ने उन्हें अपने देश से शायद बहुत दूर कर दिया था।

Sarabjit   singh को भारत-पाक सीमा पर पाकिस्तानी आर्मी ने सीमा पार करने के कसूर में पकड़ लिया और जेल में डाल दिया।

आरोपों का लम्बा सिलसिला और…

Sarabjit अब सलाख़ों के पीछे थे. उन पर आरोपों का एक लंबा सिलसिला चला। उन्हें ‘मनजीत सिंह’ के नाम से भारत से सटी कौसर सीमा पर गिरफ्तार किया गया।  उन्हें लाहौर और फ़ैसलाबाद में हुए चार बम धमाकों का आरोपी बनाया गया। इन बम धमाकों में 14 लोगों की मौत हो गई थी।

असल में हमले का असल आरोपी मनजीत था, जोकि फ़रार था।

यही नहीं Sarabjit को ‘रॉ’ का एजेंट बताकर उन पर जासूसी करने का आरोप भी लगा।

Sarabjit कैद में पाकिस्तानी सेना को बताते रहे कि वह भारतीय पंजाब के तरन-तारन के निवासी हैं। वह रा के एजेंट नहीं बल्कि पेशे से एक किसान हैं, लेकिन उनकी बात को किसी ने नहीं सुना। आरोपों को न मानने के लिए उनको जेल में प्रताड़ित तक किया गया। यह बात गले से नहीं उतर रही थी कि सरबजीत को पाकिस्तान उस गुनाह के लिए दोषी मान रहा था, जिसमें शामिल होना तो दूर, उसने उनका जिक्र तक नहीं सुना था।

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इससे भी ज्यादा दिलचस्प बात तो यह थी कि उसके परिवार को पता तक नहीं था कि वह पाकिस्तान की कैद में हैं. वह तो उसे लापता समझकर यहां-वहां खोज रहे थे. वह तो कई महीनों बात सबरजीत का खत न आता तो शायद वह जान तक नहीं पाते कि वह कहां हैं और किस हाल में है।

ये ख़त Sarabjit के परिवार के लिए दिल दहलाने वाला था. सरबजीत ने अपने खत में अपनी आपबीती को बयां किया। उसने बताया कि किस तरह से वह उसके साथ जुल्म किए गए। उन्हें पकिस्तान आर्मी एक्ट के तहत 1991 में मृत्यु की सज़ा सुनाई गई थी, हालांकि बाद में सज़ा को कुछ समय के लिए स्थगित कर दिया गया था।

निराशा के बीच नई सुबह की आस

जमाना कुछ भी कहे, लेकिन Sarabjit का परिवार उन पर लगे सभी आरोपों को दर-किनार करते रहा. खासकर उनकी बहन ने अपने भाई के इंसाफ के लिए जंग तक छेड़ दी। Sarabjit की बहन दलजीत कौर के लिए यह एक लंबी लड़ाई की शुरुआत थी, लेकिन उनके हौंसले बड़े थे। वह हर सुबह इस आस में घर से निकलती कि वह अपने भाई को घर वापस लेकर आ सके।

इसके लिए वह लगातार तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव से मिलने की कोशिश करती रहीं। अंतत: उनका यह प्रयास सफल रहा और प्रधानमंत्री ने उन्हें आश्वासन दिया कि वह सरबजीत को स्वदेश वापिस लाकर रहेंगे।

हालांकि, 2006 के आसपास उस वक्त उनकी आस को धक्का लगा, जब पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने सरबजीत की दया याचिका खारिज करते हुए उन्हें सुनाई गई मौत की सजा को बरकरार रखा।

बहरहाल, दलबीर ने उम्मीद नहीं खोई और वह अपने भाई की रिहाई के लिए हर मुमकिन कोशिश करती रहीं. इसी कड़ी में साल 2008 में Sarabjit  singh ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के यहां दया याचिक दायर की, जोकि याचिका खारिज कर दी गई। पाकिस्तान की समाचार एजेंसियों के हवाले से खबर आई कि सरबजीत सिंह को एक अप्रैल को फांसी दे दी जाएगी. वहीं 19 मार्च को दूसरी खबर में बताया गया कि सरबजीत की फांसी पर 30 अप्रैल तक के लिए रोक लगा दी गई है।

कहीं ना कहीं यह दलबीर की कोशिशों का ही असर था।

इसी साल पाकिस्तान में मानवाधिकार मामलों के पूर्व मंत्री अंसार बर्नी ने राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के पास Sarabjit की एक दया याचिका दायर की. बर्नी ने उनसे अपील की कि सरबजीत की मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया जाए या उन्हें रिहा कर दिया जाए।

पाकिस्तानी वकील ने लड़ा केस, लेकिन…

साल 2009 में ब्रिटिश वकील जस उपल ने Sarabjit की रिहाई के लिए एक ऑनलाइन अभियान भी चलाया और मानवाधिकार संस्थाओं से मामले में दख़ल देने की मांग की गई। पाकिस्तानी वकील ओवैश शेख़ ने इस अभियान का समर्थन किया और सरबजीत को छुड़ाने के लिए बिना किसी फीस के केस लड़ा।

साल 2011 में Sarabjit Singh का मामला एक बार फिर पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा। उनके पाकिस्तानी वकील ओवैश शेख ने असली आरोपी मनजीत सिंह के खिलाफ जुटाए तमाम सबूत पेश करते हुए मामला फिर से खोलने की अपील की। उन्होंने दावा किया कि सरबजीत सिंह बेगुनाह हैं और वो मनजीत सिंह के किए की सजा काट रहे हैं।

यह कोशिश कामयाब रही और साल 2012 में पाकिस्तानी राष्ट्रपति ने Sarabjit की मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया. अधिकारियों ने कहा कि भारत से कैदी की अदला-बदली के तहत सरबजीत सिंह को रिहा किया जाएगा, लेकिन बाद में पाकिस्तानी अधिकारियों ने कहा कि सरबजीत को नहीं बल्कि सुरजीत सिंह को रिहा किया जाएगा।

सुरजीत सिंह को 1980 में जासूसी के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था।

पाकिस्तान की इस बात ने Sarabjit की रिहाई को एक नई दिशा में मोड़ दिया। इसी बीच 2011 में दलबीर कौर अपने भाई से जेल में मिलने गई, तो उनके हाथ पर राखी बांधकर आईं। मानो वादा कर रहीं थी कि उन्हें वतन वापिस लाकर रहेंगी, लेकिन शायद किस्मत को कुछ ओर ही मंज़ूर था।

अप्रैल 2013 में  लाहौर की कोट लखपत जेल में छह क़ैदियों ने Sarabjit Singh पर ईंट और धारदार हथियार से हमला किया. इस हमले में उनके सिर में गंभीर चोटें आईं और वे कोमा में चले गए. उनका लाहौर के जिन्ना अस्पताल में इलाज चला, दुर्भाग्य से इलाज के दौरान ही उनकी मौत हो गई।

Sarabjit Singh की दर्दनाक कहानी सिनेमा के पर्दे पर भी दिखी..साल 2016 में आई फिल्म ‘सरबजीत‘ में उनकी कहानी बयां की गई। फिल्म में सरबजीत के किरदार को रणदीप हुड्डा ने पर्दे पर आत्मसात किया। उनके फिल्म में दमदार अभिनय की खूब सराहना हुई।

वहीं, फिल्म में ऐश्वर्या राय दलजीत के किरदार में थी। फिल्म में मुख्य रूप से बहन दलजीत के नज़रिये से कहानी को दिखाया गया था। Sarabjit का जीवन पाकिस्तान जेल कई वर्षों पहले खत्म हो गया था, पर उनके जाने का दर्द आज भी लोगों के दिलों में ज़िंदा है!

न जाने ऐसे कितने कैदी आज भी जेलों में मौजूद हैं, जो बेगुनाह हैं, किन्तु उनकी सजाओं का कोई अंत नहीं है।

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